एक गो बार की बात है- ब्रह्मा जी (हाँ जी; वही जो, औड़म-बौड़म आशीर्वाद-वरदान दे के राक्षसों और असुरों-ससुरों को, देवताओं और ‘बोर्ड मेंबरs’ की नाक में दम किए रहते हैं) के पास असुर पार्टी रोते-झींकते पहुँच गई. शिकायत क्या? कि हमें तो लोअर बेसमेंट का पाताल लोक अलॉट किया है- ठंडा, घुप्प अँधेरा, नो स्कोप फॉर लड़की-ताड़-ing “आल्सो” (बस समझ जाओ ये पोस्ट किसके लिए लिखी है 😛 ); वो भी पता चला नाग-लोक और पता नहीं किस-किस (हिंदी वाला; अंग्रेजी वाले “किस-किस” में  कौन उल्लू आदमी रोएगा-कलपेगा??) पड़ोसी के साथ-साथ शेयर करना पड़ जाता है.  देवताओं को, ऑन दी अदर हैण्ड-वा, बोले तो एकदम झक्कास स्वर्ग अकेले का दे दिया है- टॉप फ्लोर, आइटम कुड़ियों की अनलिमिटेड सप्लाई- जितनी चाहे “यूज” एंड “थ्रो”, टोटली रिसैकल (recycle) हो जातीं हैं सुना है, और पूरी दुनिया की ठाकुरदारी! कोई सूरज का मालिक है, कोई बादलों का, कोई पानी का और हवा का! बस! दिस इज ब्लडी नौट फेयर.

 

कायदे से तो ब्रह्मा जी को दादाजी की तरह दो कंटाप रसीद कर के नरक में डाल देना चाहिए था असुरों को. बोलते, “साले! नाम भर ही का उनको अलॉट हुआ है! आधे से ज़्यादा टाइम तो अख़बार में तुम्हारे ज़बरदस्ती कब्जियाने की खबर छपी रहती है! मेरा लड़का रिपोर्टर है (नारद मुनि)- सारी खबर रहती है मेरे पास! पहले तो “world peace” की मुझे पट्टी पढ़ा के अटरम-सटरम पावर ले लेते हो, और फिर बुलींग करते हो? बोर्ड में जवाब देना मुश्किल रहता है मेरा विष्णु जी को, कि मैंने ऐसा वाहियात वरदान दिया ही क्यों? अब सड़ो, ())(#&*@&)(@)”

 

पर वो ऐसा किए नहीं. ब्रह्मा जी- मन-ही-मन खी-खी कर के हँसे (अकेले ही यूनिवर्स में सिद्धू पाजी और अर्चना पूरण सिंह की हंसी से बिगड़े ‘लाफ़्टर-बैलेंस’ को सुधारने के लिए), फिर बोले, “जाओ; देवताओं को बुला लाओ!”

क्लास में मॉनिटर बात कर रहे बच्चों की पर्ची जैसे सर को देने के बाद बत्तीसी चियारता है न, उसी तरह असुर कैप्टेन (नाम मत पूछना, वर्ना हाथ उठ जाएगा, बता दे रहे हैं; वैसे ही एक सेंटेंस की बात के लिए पूरी रामायण लिख रहे हैं) देवताओं के गैंग-मास्टर देवराज इंद्र “देवा” को बुलाने गए, और पूरा गैंग ही ‘जोश’ मूवी की साइड-क्रू की तरह फुटेज खाने की उम्मीद में साथ में लग लिया.

 

वहां दोनों गैंग्स के जमा होते ही ब्रह्मा जी ने चुटकी बजाई, और सामने खीर का बुफे आ गया- वो भी मेवे वाली. पर जैसे सब लपकने चले, खटाक की आवाज हुई, ढेर सारे VFX effects हुए, और ब्रेक से जब सब लौटे तो देखा कि उनके हाथ बाजू से एकदम सामने स्ट्रेच हो के, कोहनी से टाईट हो गए हैं- किसी की कोहनी में मुड़ने का बूता नहीं बचा. बाहुबली तो दोनों साइड थे, पर ऐसा कोहनी-बली नहीं था वहाँ जो कोहनी से हाथ मोड़ सके.

 

फिर सामने एलईडी टीवी पे रूल आए, “बेटा जनों, ये पार्टी नहीं, सरप्राइज़ पेपर है. बिना कोहनी मोड़े खीर पहले और सफाई से ख़तम करने का प्रैक्टिकल एग्जाम!” (किस साइड से, किस भाषा में और कितनी गालियाँ निकलीं, ये बताने की ज़रूरत नहीं है आपको; आप दिल्ली-निवास किए हुए हैं) खैर, टू कंटिन्यु, “इस पेपर में जो गोला ज्यादा नंबर लाया, देवलोक सौ साल के लिए उसका; दूसरा साइड ‘डूगुना लगान डेगा’ (लगान भी देखी है आपने शायद!). और अगर किसी ने गन्दगी की, तो उसे स्वच्छ भारत मिशन में नोमिनेट कराएंगे मोदी जी से. एंड योर टाइम इश्टार्ट्स नाओ!”

 

असुर पार्टी ने जी जान लगा दी कोहनी मोड़ने में पहले तो- फ़िर जब कुछ नहीं हुआ (ब्रह्मा जी बुड्ढे जरुर थे, पर जादू में दम बाकी था. गाँव के पुराने, शुद्ध देसी घी का कमाल, बुढ़ापे में भी जादू बेमिसाल![जितने double meaning हो सके, सोच लो; और इन्बौक्स में बताना- क्यूंकि कमेन्ट तो तुमसे होगा नहीं!]), तो कटोरे उठा-उठा के हवा से मुंह में खीर चुआने लगे.

मीनवाइल, “देवा” इंद्र केवल दूसरों की बीवियों पर हाथ साफ़ करने और पॉलिटिक्स खेलने में ही एक्सपर्ट नहीं थे. क्लास के टॉपर भी थे, और चंट भी (very rare combination, isn’t it?). उन्होंने अपने टोले वालों को बोला कि दो-दो का पेयर बना के एक दुसरे को चम्मच से खिलाओ, वर्ना तुम्हारी भाभी आज से मेरी भी भाभी हो जाएगी- अगर ये अनर्थ हुआ तो याद रखना, एक-एक को गे बना के….

फिर आगे वही हुआ जो एक्सपेक्टेड था- लपूझिन्नाटों की सेना जब तक हाथ-मुंह का एंगल सेट करती, देवताओं ने एक-दूसरे को ठूंस के प्रैक्टिकल निपटाया, और भाभी के साथ-साथ अपनी इज्ज़त भी बचा ली.

 

तो माई डियर ^@*&&##* (random नहीं है, गिन लो),

मेरे according लाइफ़ ऐसी ही है-डोंट ब्लेम मी. ब्लेम ब्रह्मा जी. बल्कि आई थिंक मेरे-तुम्हारे ब्रह्मा जी की शकल काफी मिलती है. ऐसा तो नहीं कि दोनों कुम्भ में बिछुड़े भाई हों, विथ ऑल ड्यू रिस्पेक्ट? (तुम्हें अच्छे से पता है कि दोनों अगर रमेश-सुरेश निकले तो मुझसे ज़्यादा Cadbury 5-Star कोई नहीं बांटेगा!) अगर “बिज़नेस” है तो है- वो भी मेरी गलती से नहीं, रमेश-सुरेश की. और क्या बिज़नेस ईमानदारी और मोरैलिटी से नहीं हो सकता है?

गेम की ट्रिक ही यही है कि खुद अपने को खुद शांत नहीं कर सकते, कोहनी ही नहीं मुड़ेगी (अगर मुड़ भी जाए, तो कोहनी मोड़ के अकेलेपन का जो इलाज होता है, उसका नाम लेके दुबारा ‘b%^@%##-list’ की सवारी नहीं करनी; खाली हिंट है-it starts with “me”, and ends with “u”). पर गेम तो खेलना ही है- जो नहीं खेलेगा, वो “डूगुना लगान डेगा”.

तो एक-दुसरे को खिलाने के अलावा न कोई तरीका है, न ही, मेरे ख्याल से, 100 कौर खिलाने के बाद 1-2 निवाले की उम्मीद करना गुनाह. और कोई न भी खिलाए तो भी चलेगा- पर कम से कम खिलाने के बाद, किसी का पेट टाईट करा देने के बाद (जो कि अहसान नहीं किया, बल्कि गेम के रूल्स के हिसाब से सबकी भलाई सोची), 1-2 कौर मांग लेना इतना भो गलत तो नहीं.

 

हालांकि लगता नहीं कि इसे तुम्हारे अलावा कोई भो पढ़ रहा होगा, पर अगर कोई पढ़ के mention करे तो एक कम करना- अगली लंका उसकी लगाना, मेरी नहीं. आईटी इज इ सिंसियर रिकवेष्ट!

 

यूअर ओनली

  • यू नो हू आई ऐम! जय महाराष्ट्र! :3
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