एक बात पूछूं??

बुरा तो नहीं मानोगी?

बुरा नहीं मानोगी,
यही सोच पूछता हूँ;
क्या फ़र्क बिलकुल भी नहीं पड़ता
कि आज भी केवल तुम्हें ही पूजता हूँ?

आज भी कहीं अगर
कुछ ‘होता’ है
सबसे पहले तुम्हें ही सोचता हूँ
पर जब याद करता हूँ तुम्हारी नफरत
फिर खुद ही को बैठ कोंचता हूँ.

जब सुनता हूँ कहीं ‘ब्रेक-अप’ हो गया है
कैसे जब ‘हम’ ये लफ्ज़ ही नहीं समझ पाते थे
उन्हीं दिनों में खोकर
पुराने ‘तुम’ को खोजता हूँ

जूते-घड़ी-किताब-डायरी सब
एक दिन तुम लौटोगे और मारकर माथे पर हाथ
“हे भगवान! होगा क्या आपका, मेरे बिना; कभी सोचा है?” बड़बड़ाओगे
इसी उम्मीद में सहेजता हूँ

चाहता हूँ लिखूं मैं भी पहाड़ों
पिघले सीसे और कारों पर कविताएं
पर क्या करूँ, मालूम है न तुम्हें
सारी ‘इंस्पिरेशन’ तुम्हीं से खींचता हूँ!

कई बार मिला-मिला कर काट दिया फ़ोन
और ज़्यादा तुम्हें खो देने से डरता हूँ
पूछना बहुत कुछ चाहता हूँ
पर नाराज़ हो जाओगी, इसीलिए नहीं पूछता हूँ!!!!

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