MRR32

दिल देके तुझे हम तन्हा हो गए
कहाँ ढूँढ़ें तुझे हम अब
हम खुद में ही खुद से खो गए

बोलता मैं नहीं, बोलते तुम नहीं
फ़िर रोज़ क्यूँ बात हमारी होती है
मनाना हमने कब का छोड़ दिया, पर फ़िर
रोज़ ये तकरार क्यूँ होती है

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